कविता: न जाने कब तक

कविता: न जाने कब तक


न जाने कब तक
दर्द को यूँ छिपाना होगा,
अंधेरी रातों की तन्हाई में
चुपके-चुपके आँसू बहाना होगा।
लबों पर झूठी मुस्कान लिए
हर ग़म को भुलाना होगा,
न जाने कब वह सवेरा आएगा
जब खुलकर मुझे मुस्कुराना होगा।
न जाने कब तक
अरमानों को दफनाकर
ख़्वाबों से समझौता करना होगा,
अपनी ही खामोशियों के बीच
हर दिन जीना और मरना होगा।
न जाने कब वह पल आएगा
जब मन को सुकून का ठिकाना होगा।
न जाने कब तक
आँसुओं से भीगता रहेगा
उम्मीदों का आँचल मेरा,
न जाने कब खुशियों की बारिश होगी
और बदलेगा भाग्य का सवेरा।
उस बरसात की हर बूंद में
मुझे फिर से जीना होगा।
न जाने कब तक
काँटों भरे इस सफ़र पर
अकेले कदम बढ़ाना होगा,
राहों की मुश्किलों से लड़कर
हर दर्द को अपनाना होगा।
न जाने कब मंज़िल मिलेगी मुझे,
जब थके हुए इन पाँवों को
आराम का ठिकाना होगा।
न जाने कब तक
इंतज़ार की इस लंबी रात का
साथ निभाना होगा,
पर विश्वास है कि एक दिन
हर अंधेरा मिट जाना होगा।
उम्मीद की किरण संग फिर
जीवन में नया उजाला होगा,
और उसी दिन मेरे हिस्से भी
खुशियों का ख़ज़ाना होगा।

*रचनाकार-*
*नसु एंजल रामटेक, नागपुर, महाराष्ट्र।*

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ