अंकों का जादू बनाम आम आदमी की थालीबजट 2026 का निष्पक्ष विश्लेषण

— डॉ. सुनील कुमार 
असिस्टेंट प्रोफेसर जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर।
किसी भी राष्ट्र का बजट केवल आय और व्यय का लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि वह उस देश के भविष्य की प्राथमिकताओं का दर्पण होता है। बजट 2026-27 एक ऐसी ही वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों के बीच पेश किया गया है, जहाँ भारत एक तरफ 'विकसित भारत' के स्वप्न को साकार करने की दिशा में अग्रसर है, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी बढ़ती महंगाई और रोजगार की अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फंसा है। यह बजट इंफ्रास्ट्रक्चर और दीर्घकालिक सुधारों की दृष्टि से तो सराहनीय है, किंतु धरातल पर तात्कालिक राहत के मोर्चे पर कुछ अधूरे सवाल भी छोड़ जाता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य: बुनियादी ढांचे पर जोर, गुणवत्ता पर मंथन की आवश्यकता
बजट में शिक्षा के क्षेत्र को आधुनिक और समावेशी बनाने की ईमानदार कोशिश दिखी है। विशेषकर औद्योगिक क्षेत्रों के पास 'यूनिवर्सिटी टाउनशिप' और हर जिले में महिला छात्रावास (गर्ल्स हॉस्टल) बनाने का निर्णय स्वागत योग्य है। यह न केवल उच्च शिक्षा में लैंगिक समानता लाएगा, बल्कि कौशल विकास को उद्योगों की मांग के करीब ले जाएगा। साथ ही, AVGC (एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स और गेमिंग) जैसे भविष्य के क्षेत्रों में स्कूली स्तर पर लैब की स्थापना डिजिटल भारत की नींव को मजबूत करेगी।
स्वास्थ्य के मोर्चे पर, पांच क्षेत्रीय मेडिकल हब बनाने का प्रस्ताव देश के चिकित्सा भार को महानगरों से हटाकर विकेंद्रीकृत करेगा। 1.5 लाख केयरगिवर्स और संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवरों के प्रशिक्षण का लक्ष्य भारत को वैश्विक 'हेल्थकेयर वर्कफोर्स' का केंद्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
जनहित के वे मुद्दे, जहाँ बजट मौन रहा
सकारात्मक पहलुओं के बावजूद, एक पत्रकार और विश्लेषक के रूप में कुछ बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। मध्यम वर्ग, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इस बजट में अपनी हिस्सेदारी खोजता रह गया। आयकर स्लैब में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन न होना और महंगाई के अनुपात में मानक कटौती (Standard Deduction) का स्थिर रहना जेब पर भारी पड़ रहा है।
स्वास्थ्य के लिए आवंटन में वृद्धि तो हुई है, लेकिन वह अभी भी जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के उस राष्ट्रीय लक्ष्य से कोसों दूर है, जिसकी सिफारिश दशकों से विशेषज्ञ करते आए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) की स्थिति और वहां डॉक्टरों की उपलब्धता पर बजट में कोई स्पष्ट 'रोडमैप' न होना चिंता का विषय है।
रोजगार: कौशल बनाम अवसर का द्वंद्व
बजट का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न रोजगार है। सरकार ने 'स्किलिंग' यानी कौशल विकास पर भारी निवेश किया है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या प्रशिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त नौकरियां सृजित हो रही हैं? वर्तमान परिदृश्य में जब एआई (AI) और ऑटोमेशन के कारण पारंपरिक नौकरियां खतरे में हैं, तब बजट में प्रत्यक्ष रोजगार सृजन (Direct Job Creation) के लिए किसी बड़े राजकोषीय प्रोत्साहन का अभाव खटकता है। केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उन हाथों को काम देने वाले उद्योगों को सीधे तौर पर प्रोत्साहित न किया जाए। ऑरेंज इकॉनमी (Orange Economy): एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स और गेमिंग (AVGC)  क्षेत्र में 15,000 स्कूलों में लैब बनाना भविष्य के डिजिटल रोजगार की दिशा में सही कदम है।
इस पर भी ध्यान देना चाहिए सरकार को
•  मध्यम वर्ग को निराशा: मुद्रास्फीति (Inflation) के बावजूद इनकम टैक्स के स्लैब में कोई बड़ा बदलाव न होना मध्यम वर्ग के लिए निराशाजनक है। स्टैंडर्ड डिडक्शन में मामूली बढ़ोतरी बढ़ती महंगाई के सामने ऊंट के मुंह में जीरा जैसी है।
•  बेरोजगारी पर सीधा प्रहार गायब: बजट में 'स्किलिंग' (Skilling) पर तो जोर है, लेकिन तत्काल रोजगार सृजन (Immediate Job Creation) के लिए किसी ठोस योजना या सीधे वित्तीय प्रोत्साहन का अभाव दिखता है। डिग्रियां तो बढ़ेंगी, पर क्या नौकरियां उसी गति से सृजित होंगी?
•  स्वास्थ्य बजट और जीडीपी: स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटन बढ़ा तो है (10%), लेकिन यह अभी भी वैश्विक मानकों और जीडीपी के 2.5% के लक्ष्य से काफी दूर है। ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) की खस्ताहाली पर कोई बड़ी घोषणा नहीं दिखी।
•  शिक्षा की गुणवत्ता बनाम ढांचा: भवन और हॉस्टल बनाना अच्छा है, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए कोई विशेष बजटीय प्रावधान नहीं किया गया है।
कुल मिलाकर, बजट 2026-27 एक 'भविष्यवादी दस्तावेज' है जो आने वाले दशक के भारत की तस्वीर तो खींचता है, लेकिन वर्तमान की धुंधली छवियों को साफ करने में पूरी तरह सफल नहीं दिखता। शिक्षा और स्वास्थ्य में किए गए निवेश का फल वर्षों बाद मिलेगा, लेकिन आज के युवा को रोजगार और गृहणी को रसोई के बजट में तुरंत राहत की दरकार थी। 'विकसित भारत' की राह तभी सुगम होगी जब भविष्य की ऊंची इमारतों के साथ-साथ वर्तमान की नीव में खड़े आम आदमी का जीवन भी सुरक्षित और समृद्ध हो।

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