राजपिता रमित जी बोले- परमात्मा असीम है, उसे तन-मन-धन की शक्ति से नहीं पाया जा सकता
जौनपुर। संत निरंकारी मिशन जोन नंबर 63 अंतर्गत शाखा पट्टी नरेंद्रपुर (बरबसपुर) में रविवार को सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और राजपिता रमित जी के प्रवचनों का लाइव प्रसारण हुआ। यह कार्यक्रम संत निरंकारी मंडल दिल्ली में आयोजित किया गया। टीवी स्क्रीन पर प्रसारित प्रवचन को संतों और श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक सुना। इस दौरान प्रेम, विनम्रता, आत्मचिंतन और जीवन को सही दिशा देने का संदेश दिया गया।
सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि सत्संग केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन जीने की सीख देता है। ईश्वर के प्रति प्रेम किसी के कहने या दबाव से पैदा नहीं हो सकता। इसके लिए मन में सच्ची तड़प और ज्ञान की प्यास जरूरी है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मज्ञान किसी पर थोपा नहीं जा सकता। संत अपने उपदेशों से अधिक कर्मों के माध्यम से लोगों को प्रभावित करते हैं। इसलिए जीवन में ऐसे कर्म होने चाहिए, जिनसे संत की भावना दिखाई दे।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को एक-दूसरे का सम्मान करते हुए करुणा और प्रेम के साथ जीवन बिताना चाहिए। नफरत, ईर्ष्या और संकीर्ण सोच छोड़ना जरूरी है। स्वयं को हमेशा सही मानना आध्यात्मिक विकास में बाधा है। ब्रह्मज्ञान के बाद भी कमियां दिखाई दें तो आत्मचिंतन करना चाहिए।
राजपिता रमित जी ने कहा कि परमात्मा असीम और अनंत है, उसे किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता। तन, मन और धन के बल पर उसकी प्राप्ति संभव नहीं। झूठी पहचान और अहंकार समाप्त होने पर परमात्मा की पहचान होती है। उन्होंने कहा कि परमात्मा आस्तिक-नास्तिक और ज्ञानी-अज्ञानी सभी के लिए समान है।
उन्होंने कहा कि संसार में रहते हुए भी आसक्ति से ऊपर उठकर जीवन जीना ही भक्ति है। भक्ति का उद्देश्य मनुष्य को सही दिशा देना और आत्मसुधार की भावना जगाना है।
इस मौके पर मुखी महात्मा जयशंकर मौर्य, डॉ. वीरेंद्र प्रताप सिंह, रामनाथ प्रजापति, बाबूराम प्रजापति, विद्यावती, कमलेश कुमार, नंदलाल, दयाराम, सुभाष और भुल्लुर समेत संत व श्रद्धालु मौजूद रहे।

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