'मन की दूरियाँ'
बेशक कभी
हमारे रास्ते अलग हो जाएँ,
बातचीत कम हो जाए
और रिश्तों में दूरी आ जाए,
फिर भी इतना विश्वास रखना—
हम तुम्हारे सम्मान के खिलाफ
कभी किसी के साथ नहीं खड़े होंगे।
शिकायत हो तो कह देना,
मन में कुछ हो तो बता देना।
कड़वा लगे तो भी सच कहना,
पर चुप्पी को दीवार मत बनने देना।
क्योंकि अनकही बातें
अक्सर रिश्तों में
गलतफहमियाँ बढ़ा देती हैं।
रिश्ते कोई कपड़ा नहीं
कि मौसम बदला और बदल दिया;
वे तो पेड़ की जड़ों जैसे हैं,
जो मुश्किल समय में भी
जमीन से जुड़े रहते हैं।
अगर कभी साथ छूट जाए,
तो बीते रिश्ते को बुरा मत कहना।
दूरी बढ़ जाए तो बढ़ने देना,
लेकिन दिल में नफरत मत पालना।
क्योंकि रिश्तों की असली पहचान
सिर्फ साथ रहने में नहीं,
दूर होकर भी
एक-दूसरे का मान रखने में है।
रिश्तों में अधिकार हो सकता है,
लेकिन घमंड नहीं;
शिकायत हो सकती है,
लेकिन अपमान नहीं।
रास्ते अलग हो सकते हैं,
लेकिन इंसानियत नहीं।
याद रखना—
दूरी रास्तों से नहीं,
दिलों से बनती है।
और दिल में सच्चाई हो
तो दूरियाँ भी
रिश्तों की याद मिटा नहीं पातीं।
कभी जिंदगी में
पीछे मुड़कर देखना,
तो शायद याद आएगा—
कोई ऐसा भी था
जो साथ न होते हुए भी
तुम्हारी इज्जत की हिफाजत करता रहा।
रिश्ते जीतने की चीज नहीं,
निभाने का नाम हैं।
हर रिश्ता हमेशा साथ रहे,
यह जरूरी नहीं;
लेकिन हर रिश्ते से
सम्मान के साथ विदा होना
जरूर जरूरी है।
यही निष्ठा है,
यही स्वाभिमान,
और यही रिश्तों की
सबसे सच्ची पहचान है।
रामनरेश प्रजापति
जौनपुर, उत्तर प्रदेश



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