नशे में डूबा इंसान
कभी समझ नहीं पाएगा तुझको,
फिर क्यों यूँ हर पल
परेशान कर रही है तू उसको।
क्यों फरियाद करती है उससे,
जो सुन ही नहीं रहा तुझको,
रुलाया है जिसने हर मोड़ पर
क्यों याद कर रही है तू उसको।
कितना समझाया था दिल ने तुझको,
पर दिल दे बैठी थी तू उसको,
जो तेरी खामोशी भी न समझा
क्यों अपना बना लिया उसको।
रातों को जगाया था तुझको,
बातों से बहलाया था तुझको,
झूठे वादों के जाल में
सपनों में उलझाया था तुझको।
यूँ तन्हा छोड़ गया वो तुझको,
आँसुओं में डुबो गया तुझको,
फिर भी दिल के किसी कोने में
क्यों बसा रखा है तूने उसको।
यादों में क्यों बसाया है उसको,
जो याद भी नहीं करता तुझको,
क्यों हर दर्द सहती है तू
क्यों इतना चाहती है उसको।
जिसने तेरी कद्र न जानी,
क्यों मान बैठी तू अपना उसको,
जो हर बार तोड़ गया तुझको
क्यों जोड़ने चली है तू उसको।
सोच ज़रा, क्या पाया तूने
अपना सब कुछ देकर उसको,
खुद को ही खो बैठी तू
बस यादों में ढूँढती रही उसको।
अब वक्त है खुद को संभालने का,
आँसुओं से रिश्ता तोड़ने का,
जो तेरी कीमत समझ न सका
अब भूल भी जा तू उसको।
तू खुद में ही एक दुनिया है,
क्यों छोटा समझती है खुद को,
जिसे तेरी मोहब्बत की कद्र न हो
क्यों सौंपे बैठी है दिल उसको।
उठ, अब खुद को पहचान जरा,
अपने सपनों को थाम जरा,
जो चला गया उसे जाने दे
अब खुद से प्यार कर जरा।
नसु एंजल रामटेक, नागपुर, महाराष्ट्र
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