हिंदी साहित्य के लिए 23 दिसंबर केवल एक तिथि नहीं रह गई है। यह वह दिन है, जब साहित्य की उस परंपरा ने अपने एक अत्यंत महत्वपूर्ण हस्ताक्षर को खो दिया, जो शोर से दूर, सादगी और मौन के माध्यम से मनुष्य की आंतरिक दुनिया को अभिव्यक्त करती रही है। प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल का निधन न केवल साहित्यिक जगत की व्यक्तिगत क्षति है, बल्कि यह हमारे समय की साहित्यिक संवेदना के लिए भी एक गहरी रिक्ति का संकेत है।
विनोद कुमार शुक्ल उन लेखकों में नहीं थे, जो विचारों को घोषणापत्र की तरह प्रस्तुत करते हैं। उनका लेखन किसी आंदोलन या वैचारिक ध्रुवीकरण का हिस्सा नहीं था। इसके विपरीत, वह जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों, साधारण स्थितियों और सामान्य मनुष्य की चुपचाप सहन की जाने वाली पीड़ाओं को केंद्र में रखता था। यही कारण है कि उनका साहित्य पढ़ते समय पाठक को किसी प्रकार का वैचारिक दबाव नहीं महसूस होता, बल्कि एक गहरा आत्मीय संवाद स्थापित होता है।
छत्तीसगढ़ की भूमि, विशेषकर रायपुर, उनकी रचनात्मक यात्रा का केंद्र रही। वहीं रहते हुए उन्होंने हिंदी साहित्य को यह दिखाया कि महान साहित्य के लिए महान घटनाओं की आवश्यकता नहीं होती। नौकर की कमीज जैसे उपन्यास ने यह स्पष्ट कर दिया कि आम आदमी की प्रतीक्षा, असुरक्षा और अधूरे सपने भी साहित्य का केंद्रीय विषय हो सकते हैं। यह कृति भारतीय समाज के उस वर्ग का मौन दस्तावेज़ है, जो जीवन भर प्रतीक्षा करता है, लेकिन शायद ही कभी अपनी आवाज़ ऊँची कर पाता है।
उनकी अन्य कृतियाँ—दीवार में एक खिड़की रहती थी और पेड़ पर कमरा—भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। ये रचनाएँ शोर नहीं मचातीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे अकेलेपन, उसकी छोटी इच्छाओं और उसके अनकहे संघर्षों को सामने लाती हैं। विनोद कुमार शुक्ल का लेखन यह सिद्ध करता है कि मौन भी एक सशक्त अभिव्यक्ति हो सकता है।
उनकी भाषा विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। वह न तो अलंकृत थी और न ही कृत्रिम। साधारण बोलचाल की भाषा में गहरी दार्शनिक संवेदना रच देना उनकी विशिष्टता थी। उनके यहाँ शब्दों से अधिक महत्त्व उन रिक्त स्थानों का है, जो पाठक को सोचने, रुकने और अपने अनुभव जोड़ने का अवसर देते हैं। यह एक ऐसी साहित्यिक नैतिकता है, जो आज के त्वरित और उपभोग-केंद्रित समय में दुर्लभ होती जा रही है।
आज जब साहित्य भी अक्सर तात्कालिक प्रतिक्रिया, प्रचार और दृश्यता की होड़ में शामिल दिखाई देता है, विनोद कुमार शुक्ल का लेखन हमें ठहराव का महत्व समझाता है। उनका साहित्य यह स्मरण कराता है कि संवेदना, करुणा और मानवीय दृष्टि अब भी साहित्य के मूल मूल्य हैं। वे पाठक को निर्देश नहीं देते, बल्कि उसके साथ सहयात्री की तरह चलते हैं।
उनका निधन हिंदी साहित्य में उस परंपरा को कमजोर करता है, जो सादगी को सौंदर्य और मौन को भाषा मानती है। यह क्षति केवल साहित्यकारों की नहीं, बल्कि उस समाज की भी है, जो साहित्य के माध्यम से स्वयं को समझने की कोशिश करता है।
विनोद कुमार शुक्ल भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनका लेखन हमारे समय से लगातार प्रश्न करता रहेगा—क्या हम अब भी संवेदना को सुनने का धैर्य रखते हैं?
यही किसी सच्चे लेखक की सबसे बड़ी उपस्थिति होती है।
लेखक-अभिषेक उपाध्याय श्रीमंत
प्रभारी प्राचार्य -एस वी डी गुरुकुल महाविद्यालय, ऊंचगांव, जौनपुर।
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