बहुरूपिया.....!
गाँव-देश-समाज में....!
उल्लास के अवसर पर...
हम सब ने देखा है....!
हँसी-विनोद-प्रहसन करता हुआ,
एक निराला पात्र....बहुरूपिया....!
खुद से किया गया,
सिंगार-पटार,रंग-रोगन...और...
खुद से रचा हुआ स्वांग.....
विषय....हर बार....!
एक नवीनता लिए हुए....
हरकतें....कभी बचकानी सी...
कभी उमड़ी हुई जवानी की....
कोई दमदार कहानी...या फिर...
कभी दादा-दादी,नाना-नानी की
वर्षों से चली आ रही,
वही तोता-मैना-परियों वाली....
रटी-रटाई....रोचक कहानी....
उद्देश्य इस बहरूपिया का....!
मनोरंजन और बस मनोरंजन.....
अपेक्षा....बस इतनी सी....
मुस्कान अधरों पर सभी के आए...
ज्यादा नहीं तो...हल्की सी....
बदले में मिल जाए...बस इतना सा..
कि जीता रहे खुद वह बहुरूपिया...
और उसका परिवार अदना सा...
मित्रों ज़माने में बदलाव तो देखो....
आज के दौर में....!
यह बहुरुपिया प्रजाति....
अब कहीं भी दिखाई नहीं देती......
विकास इतना हो गया है कि....!
गाँव-देश-समाज में अब तो....
उनकी...कोई पुछाई भी नहीं होती..
मित्रों....ऐसा नहीं है कि....
गाँव-देश-समाज में....
गीत-संगीत-नौटंकी की....
ध्वनि अब सुनाई नहीं देती....
सच तो यह है प्यारे....
कि....आज का आदमी....
कल्पित और आभासी.....!
जीवन जी रहा है....
खुद ही अंदर से बहुरूपिया है,
और....वास्तविक जीवन से दूर....
बस बाहर से आदमी दिख रहा है...
और...इसीलिए....
बहुरूपिया की जरूरत....!
हमारे गाँव-देश-समाज को.....
दिखाई नहीं देती...दिखाई नहीं देती
रचनाकार.....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ


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